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अंतिम सत्य

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अंतिम सत्य  दर्द बहोत हुआ मुझे जब  मै  सो रहा था । हर शख़्स जो जुड़ा था दूर मुझसे हो रहा था ।  जिसने ज़िन्दगी मुझको अपनी दान थी कर दी ! वह भावना का पानी उसकी आँखों को भी धो रहा था  ।  वो शख़्स भी दुखी था जिसमे अंश था मेरा , दिल बाँध कर अपना, वो व्यवस्था देख रहा था ।  क्या अनोखा एहसास था वो, बचपन के बाद आज मुझको बड़ी शिद्दत से नहलाया गया था। नए वस्त्रों मे मुझको लोगों के बीच लाया गया था।  डरा था मै थोड़ा, जब बांस की बनी सैय्या पे मुझको लिटाया गया था। कहीं मै भागूं नहीं ये सोच , सूत की रस्सी से मुझको बाँधा गया था । जँच रहा था मै, जब लाल,सुनहरा कफ़न मुझे ओढ़ाया गया था । चली जब बारात तो देखा बहुत लोग थे आये , मगर, सिर्फ चार कन्धों के सहारे मुझको उठाया गया था।  पहुँचा जो मंजिल पर तो आश्चर्य हुआ  मुझको । जिस लकड़ी के झूले मे बचपन था सजा मेरा , उसी लकड़ी का मरणसेज मेरे लिए सजाया गया था ।  उसी आग मे जला कर राख कर डाला, जिस आग से बचपन मे मै डराया गया था...

कन्यादान के बाद

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"कन्यादान के बाद" कविता का शीर्षक इसलिए लिखता हूँ क्योकि यह कविता में मैंने एक पिता का दुःख बताया है । आप सब हसेंगे मगर जैसे पुत्र-वियोग होता है वैसेही पुत्री-वियोग भी होता है । इस कविता में मैंने यही पुत्री-वियोग को बताने की कोशिश की है । कन्यादान के बाद  नहीं आपबीती ये किसी की है ,  मैं आत्मा पे बीती कह देता हूँ । (मैं )पिता नहीं किसी पुत्री का, तब पर भी दुःख कन्यादान का बतलाता हूँ । जिन हाथों से उसको पाला था , उन्हीं हाथों से उसको विदा किया । दी क़ीमत भी उस लड़के की , संग बेटी को अपनी विदा किया । तेरा दिया तोहफ़ा गवाँ दिया , हाय राम ! ये कैसा मैंने सौदा किया ? जिसके बचपन से आँसू पोछे थे , उसे आज़ मैने ही रुला दिया । जो कल तक मेरे घऱ की रानी थी , आज किसी के घऱ की दासी बना दिया । तेरा दिया तोहफ़ा गवाँ दिया , हाय राम ! ये कैसा मैंने सौदा किया ? जब माँ उसकी, मुझको कुछ कह देती थी , मेरी ख़ातिर अपनी माँ से वो लड़ लेती थी । जिसने क़दम क़दम मेरा साथ दिया , कैसे मैंने उस कन्या का दान दिया ? तेरा दिया तोह...

कवयित्री

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कविता लिखूँ ,मै कविता पढ़ूँ , मै कविता से अपनी मोहब्बत करूँ, कविता मे मेरी कवयित्री बसी , उस कवयित्री पे पूर्ण विराम भरूँ । मेरी कविता की शोभा बढाती है ये , ख़ुशबू कविता मे फैलाती है ये , पूरी कविता में उसका ही वर्णन करूँ , इसलिए कवयित्री पे पूर्ण विराम भरूँ । ( उसका वर्णन करता हूँ ) एक मासूम चेहरा, जिस पर बालों का पहरा रहे , निगाहें कहीं पड़ गई मुझपर, तो जख्म निगाहों का गहरा रहे , हर वक़्त उससे मिलने की ख़्वाहिश रखूँ , इसलिए कवयित्री पे पूर्ण विराम भरूँ। ( कवयित्री का कलम पर प्रभाव ) बोलो भी इस कलम का अब मै क्या करूँ ? रोने पे उसके दुखी हो उठे , वो मुस्कुराये तो मोहब्बत की कविता ये बुने , मेरी चाहत को अपनी लिखावट ये दे ,  कवयित्री पे ये भी पूर्ण विराम भरे । देख के ये सब मुझको हँसी आ गयी, देखा जब उसे तो मानो परी आ गयी , जिसको देखा था सपनों मे वही आ गयी , अब तो उसकी रचना पर अपनी मै रचना करूँ , इसलिए कवयित्री पे पूर्ण विराम भरूँ । सपनों मे चेहरा पूरा दिखा था नहीं , जब देखा उसे मै रुक गया था वहीं...

रिश्ता

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                                                                                        रिश्ता दो दिलों के तार का बंधन होता है । एक रिश्ते का यह प्रकार भी होता है जो एक इंसान का खुद से हो । ऐसे रिश्ते को मनुष्य अपने स्वाभिमान या आत्म-सम्मान से जोड़ता है । अगर हम दो दिलों के रिश्ते की बात करें तो यह रिश्ते दो दिलों के बीच तब आते हैं जब उनका जो अपना खुद से रिश्ता होता है दोनों दिलों का, वह उन्हें एक दूसरे के रिश्ते की तरफ आकर्षित करता है । यह मुर्ख  मनुष्य के समझ से परे हैं ।  यह दो दिल एक दूसरे के रिश्ते से आकर्षित तब होते हैं जब उन्हें सामने वाले का स्वभाव , बातें करने का तरीका और कुछ समानताएँ जो एक दूसरे से मेल खाती हों, ऐसा महसूस हो ।  उपयुक्त अनुच्छेदों में हम सबने रिश्तों का मतलब और उनके प्रकार को जाना । अब रिश्तों को...

आज आप मिले...

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आज आप मिले, हमे देखा, ये आप के लिए नया होगा । हमारे ज़ेहन मे तो आप इस कदर बसीं हैं कि बंद आँखों से भी हर वक़्त आपका दीदार करते हैं । शान ( उर्फ़ सुभम ) की कलम से।  ……… 

निगाहें

निगाहें चार हो जाएँ मैं तलबदार हूँ उसका , महफ़िल-ए-दोस्तों में बात हमेशा राज़ रखता हूँ | शान(उर्फ़ सुभम ) की कलम से ………… 

हुस्न की बात

तारीफ़ें बर्बाद मत कर दो, इसे तुम सहेज कर रखो। हुस्न की बात करने को यहाँ चेहरे बहोत हैं । शान (उर्फ़ सुभम) की कलम से। ..........